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1857 ईसवी की महान क्रांति

 1857 ईसवी की महान क्रांति आधुनिक भारत के इतिहास की एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटना थी| यह भारतीयों द्वारा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ व्यापक किन्तु असफल विद्रोह था| इतिहासकर बी डी सावरकर के अनुसार यह भारत का प्रथम स्वंत्रता संग्राम था| सर जॉन लोरेंस एवं सीले के अनुसार यह पूर्णतया सिपाही विद्रोह था| यह एक सैन्य विद्रोह के रूप में शुरू हुआ और धीरे धीरे इसने भारतीयों का समर्थन भी प्राप्त कर लिया| इस ब्लॉग में मैंने सरल शब्दों में 1857 ईसवी की महान क्रांति को समझाने का प्रयास किया है|

History of Revolt of 1857 in india

1857 ईसवी की महान क्रांति


विद्रोह के कारण

लॉर्ड डलहौजी की राज्य हड़प नीति|

व्यपगत का सिधांत यानि किसी राज्य का पुरुष वारिस न होने पर उसे अपने अधिकार में ले लेना|

लॉर्ड वेलेजली की सहायक संधि|

अंग्रेजों द्वारा भारत का आर्थिक शोषण|

भारतीयों को पदोन्नति से वंचित रखना|

युद्ध के लिए भारत की सीमाओं से बाहर भेजना|

चर्बी युक्त कारतूस के प्रयोग की बात से सैनिकों में आक्रोश पैदा हुआ यह अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति का तात्कालिक कारण था|


विद्रोह का आरंभ

29 मार्च 1857 ईसवी को मंगल पांडे नामक एक सैनिक ने बैरकपुर में गाय और सूअर की चर्बी से बने कारतूस को मुंह से काटने से मना कर दिया| यह घटना 1857 के विद्रोह का प्रुख कारण बनी|

8 अप्रैल 1857 ईसवी को मंगल पांडे को गिरफ्तार कर फांसी दी गई| 

10 मई के दिन मेरठ की पैदल टुकडी से की क्रान्ति की शुरुआती हुई।

11 मई को मेरठ से विद्रोही सैनिकों ने दिल्ली पर मार्च किया और बहादुर शाह जफर को भारत का बादशाह घोषित किया|

धीरे-धीरे विद्रोह देश के अन्य क्षेत्रों जेसे दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, झाँसी, ग्वालियर, बरेली, इलाहबाद, बनारस, और बिहार में फैला|

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी और ग्वालियर में विद्रोह का नेतृत्व किया क्योंकि अंग्रेजों ने उनके दत्तक पुत्र को झाँसी के सिंघासन पर बैठाने से इनकार कर दिया था|

4 जून को लखनऊ में विद्रोह की शुरुआत हुई|

5 जून को कानपुर में विद्रोह की शुरुआत हुई|

कानपुर में पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब ने विद्रोह का नेतृत्व किया जिसमें उनकी सहायता तात्या टोपे ने की।


1857 के विद्रोह की असफलता के कारण 

विद्रोहियों में नेतृत्व की कमी|

एकता का भाव कई बड़ी रियासतों ने विद्रोह में भाग नही लिया|

ग्वालियर के सिंधिया हैदराबाद के निजाम आदि राजाओं ने अंग्रेजों का खुलकर साथ दिया|

उच्च तथा मध्य वर्ग के अधिकांश लोग व्यापारी वर्ग सूदखोर बंगाल के जमीदार आदि अंग्रेजों के प्रति वफादार बने रहे।


विद्रोह के प्रभाव

कांति की असफलता के उपरांत सेना में अंग्रेजी सैनिकों और पदाधिकारियों की संख्या मैं वृद्धि की गई|

जिन्होंने क्रांति में भाग लिया था उन्हें ग्रह लड़ाकू घोषित किया गया और सेना में उनकी संख्या कम कर दी गई|

कंपनी का शासन समाप्त करके ब्रिटिश सरकार ने इसे अपने हाथों में ले लिया इसके लिए भारत शासन अधिनियम 1858 पारित हुआ|



1857 का विद्रोह लॉर्ड कैनिंग के काल की सबसे प्रमुख घटना थी जिसके बाद भारत का शासन कंपनी के हाथों से सीधा ब्रिटेन सरकार के नियंत्रण में चला गया| 1856 से 1862 ईसवी तक लॉर्ड कैनिंग भारत के वायसराय बनके रहे| भारत के वायसराय के बारे में अधिक जानकारी के लिए यह लेख पढ़े|







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